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व्रहस्पतिवार व्रत कथा
February 8, 2024July 17, 2025

बृहस्पतिवार व्रत कथा | Bhraspativar Vrat Katha

  • बृहस्पतिवारके व्रत में भगवान विष्णु की पूजा अर्चना की जाती है।
  • अन्य व्रतों के भाति इस व्रत को भी सूर्यास्त के बाद खोला जा सकता है।
  • बृहस्पतिवार व्रत करने से मान सम्मान में वृद्धि, व्यपार में लाभ, दीर्घायु का वरदान मिलता है।

बृहस्पतिवार व्रत कथा | Bhraspativar Vrat Katha In Hindi

प्राचीन काल में एक राजा राज करता था। वह बहुत ही दानी था, और धर्म कर्म पर विश्वास करता था। वह रोज मंदिर जाकर भगवान के दर्शन तथा पूजा करता था। यह सब उसकी पत्नी को पसंद नहीं था। वह पूजा पाठ दान धर्म में बिल्कुल भरोसा नहीं करती थी।

एक दिन राजा जब शिकार करने गए थे, तो भगवान बृहस्पति एक साधु का रूप धारण कर के राजा के महल गए। वहा उन्होंने जब भिक्षा मांगी तो रानी ने भिक्षा देने से इनकार कर दिया, और बोली की साधु महराज मै दान धर्म से बहुत दुखी हूँ , ये सब कार्य के लिए मेरी पति ही ठीक है।

कृपया आप ऐसे कृपा करे की सब धन नष्ट हो जाए, और मै आराम से रह सकु। तब बृहस्पति भगवान ने बोला, हे रानी धन और संतान से कौन दुखी होता है। इसकी कामना तो सभी करते है। अगर आपको ईश्वर ने ज्यादा धन संपत्ति दी है, तो आप इसको दान धर्म में खर्च करो

भूखे को भोजन कराओ , कुआ खुदवाओ, मंदिर बनवाओ और धर्मशाला का निर्माण कराओ, निर्धन की मदद करो, निर्धन परिवार की कन्याओ का विवाह कराओ। ऐसे करने से जनकल्याण होगा और तुम्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी।

साधु महराज के उपदेश का “रानी” पर कोई प्रभाव न पड़ा। वह बोली हे महात्मा मुझे ऐसे धन नहीं चाहिए। जिसको मै दूसरों को दान में दु। तब साधु महात्मा ने बोला की अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो मै जैसे बोलता हूँ, वैसे ही करना

बृहस्पतिवार के दिन घर को गोबर से लीपना, अपने बाल को पीली मिट्टी से धोना, अपने पति से बोलना वह बृहस्पतिवार के दिन हजामत कराए, भोजन में मांस मदिरा का सेवन करो, और उस दिन कपड़ों को धोबी को धुलने को दो।

तुम्हारा धन नष्ट हो जाएगा इतना बोलकर साधु महराज अंतर्ध्यान हो गए। साधु महराज ने जैसा बताया था। रानी ने वैसे ही किया। 3 बृहस्पतिवार ही बीते थे, की उसका सारा धन संपत्ति नष्ट हो गई और वह भोजन के लिए तरसने लगे।

एक दिन जब राजा ने रानी से बोला मै परदेश काम को चला जाऊ क्यूकी यहा सब जानते है। काम नहीं कर सकता, ऐसा बोलकर राजा परदेश को चले गए। वहा जाकर जंगल से लकड़िया काटकर लाता और उसे शहर में बेच कर अपना जीवन व्यतीत करने लगा ।

इधर राजा के बिना रानी दुखी रहने लगी। किसी दिन भोजन मिलता किसी दिन जल पीकर रहना पड़ता। एक बार जब रानी और दासी को बिना भोजन के सात दिन रहना पड़ा, तो रानी ने अपनी दासी से बोला की पास के नगर में मेरी बहन रहती है, वह बहुत धनवान है।

तुम वहा जो और 5 सेर बेझर मांग के ले आओ ताकि अपना गुजर बसर हो सके। दासी रानी के पास गई, और अपनी रानी का समाचार दिया। उस दिन बृहस्पतिवार था। और रानी कथा सून रही थी,इसीलिए कोई उत्तर नहीं दिया।

कोई उत्तर न मिलने से दासी क्रोधित हुई और वापस आकर अपनी रानी को बताया। यह सब सुनकर रानी ने जवाब दिया इसमे उसका कोई दोष नहीं है, जब बुरे दिन आते है तो कोई सहारा नहीं होता है, यह सब हमारे भाग्य का दोष है।

उधर रानी की बहन जब कथा सुन कर उठी तो सोचने लगी मेरी बहन की दासी आई थी, लेकिन मै  उससे बात नहीं की वो दुखी हुई होगी। यह सोच वह अपनी बहन के घर गई और बोली हे बहन जब तुम्हारी दासी गई थी। तो मै बृहस्पतिवार की कथा सुन रही थी। जिसमे तब तक नहीं बोलते और उठते है, जब तक पूजा होती है।

कहो, दासी क्यों गई थी? रानी बोली बहन मेरे घर अनाज नहीं था। इसीलिए 5 बेझर लाने को दासी को भेजी थी । रानी की बहन बोली भगवान बृहस्पति सब की मनोकामना पूर्ण करते है जाओ अंदर देखो शायद तुम्हारे यहा अनाज हो।

पहले तो रानी को बात पर विश्वास नहीं हुआ पर बहन की बात मानकर दासी को अंदर देखने को  भेजा। जब दासी अंदर गई तो उसे घर में एक घड़ा भर के बेझर मिला। और वह यह बात रानी को आ कर बताई और बोली की हे रानी जब हमे भोजन नहीं मिलता है तो हम व्रत ही तो रहते है।

क्यू न हम भी बृहस्पतिवार का व्रत एवं पूजा विधि पूछ ले और व्रत करे। रानी को दासी की बात अच्छी लगी, और वह अपनी बहन से बृहस्पति व्रत के बारे में पूछा। तब रानी की बहन ने व्रत की विधि बताई, इस व्रत में चने की दाल , गुड, मुन्नका, केले के जड़ से भगवान विष्णु की पूजा करे,

दीप जलाए और कथा करे। व्रत के दिन एक समय भोजन करे और भोजन में पीले खाद्य पदार्थों का सेवन करे। इससे भगवान विष्णु प्रसन्न होते है, और पुत्र, धन, अन्न का वरदान की प्राप्ति होती है। पूजा विधि बताकर रानी की बहन अपने घर लौट आई।

रानी और दासी दोनों ने निर्णय लिया की वो भगवान विष्णु का व्रत करेंगी। सात दिन बाद जब बृहस्पतिवार आया तो उन्होंने व्रत रखा। घुड़साल में जाकर दासी चना, गुड, बिन लाई और भगवान बृहस्पति की पूजा किया।

पूजा करने के बाद अब वे पीला भोजन कहा से लाए इसीलिए दुखी थी। लेकिन भगवान विष्णु उनकी पूजा से प्रसन्न थे। इसीलिए वो एक साधारण व्यक्ति के रूप में 2 थाली में भोजन लेकर आए और दासी को दिया और बोले की यह भोजन तुम्हारे तथा रानी के लिए है इसे खा लेना।

दासी ने जाकर रानी से बोला रानी जी आप भोजन कर लीजिए। रानी को लगा दासी उनके साथ उपहास कर रही है। इसिलिय रानी ने बोल तुम कर लो भोजन। तब दासी ने बोला की एक व्यक्ति भोजन दे गया है। यह सुन रानी बहुत प्रसन्न हुई, और भगवान विष्णु को नमस्कार कर भोजन ग्रहण किया।

इसके बाद वो हर बृहस्पतिवार का व्रत और पूजन करने लगी। भगवान बृहस्पति की कृपा से फिर से धन संपत्ति या गई। लेकिन रानी फिर से आलस करने लगी। तब दासी ने रानी को समझाया आप पहले भी आलस करती थी, आपको धन संपत्ति रखने में कष्ट होता था। इसीलिए सब धन नष्ट हो गया।

अब हमारे पास धन है, तो हमे दान करने चाहिए, भूखों को भोजन, कुआ, तालाब, पाठशाला का निर्माण  करना चाहिए। दासी की बात सुनकर रानी दान एवं शुभ कार्यों को करने लगी जिससे उसका यश फैलने लगा।

एक दिन रानी यह सोचने लगी न जाने राजा किस हाल में और कहा होंगे। भगवान विष्णु से प्रार्थना की राजा जहा कही भी हो जल्द ही लौट आए।

उसी रात्री को विष्णु जी राजा के सपने में आए, और बोले हे राजा तुमहरी रानी तुम्हें याद कर रही है, तुम अपने नगर को वापस चले जाओ। राजा सूर्योदय होते ही उठा और जंगल से लड़की काटने के लिए चल पड़ा और सोचने लगा की रानी की गलतियों की वजह से उसे कितने तकलीफ साहनी पड़  रही है।

और अपनी दशा देख कर परेशान हो गया। तभी भगवान विष्णु एक साधु का रूप लेकर राजा के पास आए और बोले हे लकड़हारे तुम इस जुंगल में किस चिंता में बैठे हो ?राजा ने साधु की बात सुनकर अपनी व्यथा बताई।

साधु ने राजा को समझाया, हे राजन तुम्हारी पत्नी ने भगवान व्रहस्पति के प्रति अपराध किया था, जिसके कारण तुमहरी ये दशा हुई है। तुम चिंता मत करो। तुमहरी रानी ने भगवान बृहस्पति का व्रत करना शुरू कर दिया है।

तुम्हें भी भगवान विष्णु की व्रत एवं पूजा विधि विधान से करने चाहिए। यह सुन राजा ने साधु महात्मा को बताया लकड़ी बेचने के बाद इतने पैसे नहीं होते की मै भोजन के अलावा कुछ बच सकु, और पूजा सामग्री ला कर पूजा व्रत कर सकु।

तब साधु महतम ने बोल की हे राजन तुम बस बृहस्पति भगवान का व्रत का संकल्प लो बाकी आगे की राह व स्वयं दिखा देंगे। राजा ने ऐसे ही किया भगवान बृहस्पति के व्रत का संकल्प लिया और पूजा की और उसे मनोवांछित फल की प्राप्ति हुई।

अतः जो भी व्यक्ति भगवान बृहस्पति का व्रत पूजा कथा करता है उसकी जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते है।  

कथा बृहस्पतिवार व्रत कथा

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