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kartik maas ki katha
March 12, 2024July 17, 2025

कार्तिक मास की कथा

हमारे हिन्दू धर्म मे कार्तिक मास को बहुत ही पवित्र माना जाता है। माना जाता है की भगवान विष्णु इस दिन अपनी योगनिद्रा से बाहर आये थे, और इस सम्पूर्ण जग का कल्याण किया था। 

किसी नगर मे एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहते था। ब्राह्मण और उसकी पत्नी प्रतिदिन नदी मे स्नान करने 7 कोश दूर जाते थे। इतनी दूर स्नान करने जाने के कारण ब्राह्मण की पत्नी बहुत थक जाती थी।

एक दिन दुखी होकर ब्राह्मणी ने ब्राह्मण देव से बोला, अगर हमारा एक पुत्र होता तो कितना अच्छा होता। पुत्र की शादी कर देते तो हमारी बहू आती और हमारी सेवा करती।  

यह सुन ब्राह्मण देव ने कहा मै बाहर जा रहा हु, तुम मेरे लिए एक पोटली में आटा बांध दो, जिसमे कुछ मोहरे डाल देना। पत्नी ने ब्राह्मण के कहेनुसार ऐसा ही किया।

ब्रह्माण देव यात्रा पर चल दिए, और चलते-चलते वो यमुना नदी के किनारे जा पहुचे। नदी के किनारे उन्होंने छोटी – छोटी कन्याओ को देखा जो रेत के घर बना के खेल रही थी। उसमे से एक कन्या ने खेलते-खेलते बोला, मै इस घर को नहीं तोड़ूँगी क्यू की मुझे इसमे रहना है।

कन्या की यह बात सुन कर ब्राह्मण देव अत्यंत प्रसन्न हुए और विचार किए की यही लड़की बहू बनाने लायक है। तभी लड़की खेल कर उठी, और अपने घर को जाने लगी। यह देख ब्राह्मण देव भी उसके पीछे जाने लगे।

पीछा करते-करते वह कन्या के घर जा पहुचे। वहा जाकर कन्या से बोले की कार्तिक माह का महिना है, मै किसी के घर भोजन नहीं करता, क्या तुम्हारी माता मेरा आटा छान के रोटी बना के दे देंगी। जिससे मै भोजन कर सकु।

यह सुन कन्या अपने माता के पास गई, और उनको ब्राह्मण देव की बात बताई। कन्या की मा ने बोला जाओ ब्राह्मण देव से बोलना की वो मुझे अपना आटा दे दए , मै उनको रोटिया बना के दे दूँगी।

ब्राह्मण देव ने अपनी पोटली कन्या को दे दी। कन्या की माता ने जैसे ही पोटली खोल के आटा छानना शुरू किया, उसने देखा आटे में सोने की मोहरे है। मोहरे देख वह अचंभित हो गई। कन्या की माता ने सोचा की, इस व्यक्ति के पास जब आटे में इतनी मोहर है, तो घर पर कितनी होंगी।

यह सोच वह ब्राह्मण देव के पास गई और बोली, आपके आटे से मोहरे निकली है, क्या आप अपने पुत्र की सगाई करने या किसी शुभ कार्य पर जा रहे है ? तभी ब्राह्मण देव ने बोला मेरा पुत्र काशी पढ़ने गया है, परंतु मै उसके विवाह के लिए कन्या की तलाश में अवश्य हूँ।

अगर आपको कोई समस्या न हो तो मुझे आपकी पुत्री पसंद है। मै इसे खांड कटोरे से विवाह कर, अपनी बहू बना कर लिवा जाना चाहता हूँ। यह सुन कन्या की माँ ने कहा ठीक है, मुझे कोई ऐतराज नहीं है।

कन्या की माँ ने पुत्री का विवाह खांड – कटोरे से करा दिया, और पुत्री को विदा कर दिया। घर पहुच कर ब्राह्मण देव ने पत्नी को आवाज लगाई। भाग्यवान मै तुम्हारे लिए बहू लेकर आया हु, जल्दी से आओ स्वागत सत्कार करो।

यह सुन पत्नी को विश्वास नहीं हुआ और वह अंदर से ही बोली, हमारा तो कोई पुत्र ही नहीं है तो बहू कहा से आएगी। ब्राह्मण देव ने बोला, आओ तो सही देखो बहू आई है।

ब्राह्मण देव की बात सुन कर कर, ब्राह्मणी बाहर आई और बहू को देखकर प्रसन्न हो गई, और बहू को अपने साथ सम्मानपूर्वक लेकर गई। अब  से जब भी ब्राह्मण और उसकी पत्नी नदी स्नान को जाते, तो बहू उनके आने से पहले सारा घर का काम खत्म कर के भोजन तैयार  रखती थी।

और उनके आने के बाद वह उन्हें खाना परोसती, उनके कपड़े धोती और घर की देखभाल करती। एक दिन ब्राह्मणी ने अपने बहू से बोला, तुम कभी भी चूल्हे की आग न बुझने न देना और न ही मटके का पानी खत्म होने देना, इतना बोल कर वह स्नान करने नदी को चली गई।

बहू काम करने में सास की बात भूल गई, और चूल्हे की आग बुझ गई। अचानक से उसे याद आया की सास ने उसे जो बोला था, वो भूल गई है। यह सोच वह दौड़ कर पड़ोस में गई और बोली, आप मुझे थोड़ी सी आग दे दिजिए मेरे सास – ससुर स्नान को गए है वो आते ही होंगे और भूखे प्यासे होंगे।

यह सुन पड़ोसन हंस पड़ी और बोली, तुम्हारे सास ससुर तुम्हें बेवकूफ बना रहे है। उनका कोई बेटा नहीं है। यह सुन ब्राह्मण देव की बहू ने कहा, मेरे सास ससुर ने बोला है की उनका पुत्र काशी गया है विद्या प्राप्त करने।

पड़ोसन ने ब्राह्मण की बहू को अपने बातों में फसा लिया, और उसे पट्टी पढ़ाई की वो अपने सास ससुर की बात न माने। जब वो घर आये तो उनकी सेवा न करे, खाना जला हुआ बना के दे और सभी कोठे की चाभी मांग ले।

बहू ने ऐसा ही किया जब शाम को सास ससुर आये, तो उन्हे खाने में रोटी जली हुई और दाल सब्जी में नमक ज्यादा डाल के दे दिया, और सास ससुर को बहुत बुरा – भला सुनाया।

और सास से झगड़ा कर के बोली, मुझे सातों कोठे की चाभी चाहिए। सास ने समझाया पर उसकी जीद देखर उन्होंने चाभी दे दिया। चाभी देकर सास ससुर स्नान करने नदी को चले गए। सास के जाने के बाद बहू ने कोठे को खोला, तो देखा की किसी में धन भरा है, किसी में अनाज रखा है, किसी में सोने चांदी और पीतल के बर्तन पड़े है।  

जब उसने सातवा कोठा को खोला तो देखा की उसमे माता लक्ष्मी, श्री हरि विष्णु, 34 कोटी के देवि – देवता, नदिया झरना आदि विराजमाँन है, पास में ही एक लड़का भी उसी कोठे में बैठे कर ईश्वर का जाप कर रहा था।

उसे देखकर बहू ने उनसे पूछा की आप कौन है,जो यह पर बैठे है? यह सुनकर कर लड़के ने जवाब दिया, मै तुम्हारा पति हु। अभी तुम इस दरवाज को बंद कर दो,जब मेरे माता पिता आये तो उन्हे बुलाया के लाना और दरवाजा खोल देना।

शाम हुई सास ससुर आ गए। बहू ने उनके लिए अच्छे से अच्छे पकवान बनाया और आते ही  उनकी सेवा करने लगी। खाना खाकर ब्राह्मणी जब लेटने गई, तो बहू ब्राह्मणी का पैर जा कर दबाने लगी, और बोली आप इतनी दूर स्नान करने क्यू जाती है घर पर ही स्नान क्यू नहीं किया करती।

तब सास ने बोला, घर पर यमुना जी नहीं है, इसीलिए मै दूर जाती हु स्नान करने। तभी बहू ने बोला माँ घर में ही यमुना जी विराजमान है, और आप इतनी दूर जाती है स्नान को। इतना बोल कर वह सास को लेकर सातवे कोठे के पास ले गई और दरवाजा खोल दिया।

कोठे में लड़के को बैठ देखकर, ब्राह्मणी ने बालक से पूछा तुम कौन हो बेटा? तभी उस लड़के ने बोला मै आपका बेटा हु माँ । माँ ने बेटे से कहा की कौन मानेगा की तू मेरा बेटा है। तब लड़के ने बोला माँ आप साधु महात्मा से मिलिये, वो आपको उपाय बताएंगे की सबको पता चल जाए की मै ही आपका ही पुत्र हु।

 यह सुन माँ ने पंडित, साधु महात्मा से मिली और उपाय पूछा। सब ने यही बोला की तुम्हें एक परीक्षा देनी होगी, जिसमे इस पार बहू बेटे रहेंगे और दूसरी तरफ तुम चमड़े के वस्त्र पहन कर खड़ी रहोगी।

 अगर तुम्हरे आँचल से दूध निकल कर, तुम्हरे पुत्र का दाढ़ी मुछ भीग गया तो मान लिया जाएगा ये तुम्हारा ही पुत्र है। ब्राह्मणी ईश्वर को याद कर, चमड़े का वस्त्र पहन कर परीक्षा देने को तैयार हो गई।

तभी चमड़े का वस्त्र फट गया और उसके आँचल से दूध की धारा निकल कर उसके पुत्र की दाढ़ी मूँछ भीग गई। यह देख सभी बहुत प्रसन्न हुए और सभी ने मान लिया की वो लड़का ब्राह्मणी का ही पुत्र है। और अब ब्राह्मण और उसकी पत्नी अपने पुत्र और पुत्रवधू के साथ सुखी पूर्वक निवास करने लगे।   

कथा कार्तिक मास की कथा

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